बुन्देलखण्ड ललितपुर

मानव जीवन की सुखशांति ही धर्म का प्रमुख ध्येय

ललितपुर। नगर के पुलिस लाइन स्थित सुप्रसिद्ध मुक्तिधाम मंदिर में नवरात्रि के पावन अवसर पर आयोजित श्रीमद भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ के चौथे दिन संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान डा.ओमप्रकाश शास्त्री ने श्रद्धालु जनमानस को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारत की संस्कृति प्रार्थना प्रधान है। ऋगवेद से लेकर गीता तक जो भी धार्मिक ग्रंथ विद्यमान हैं उनमें स्पष्ट रूप से हमारे पूर्वज नित्य प्रति विश्व कल्याण हेतु ईश्वर से प्रार्थना करते थे। प्रार्थना का शाब्दिक अर्थ है विनय, निवेदन, किसी से कुछ मांगना, याचना करना। याचना धन की हो सकती है। यश, बल, विद्या, पुत्र अथवा सुख की हो सकती है। डा.शास्त्री ने कहा कि सम्पूर्ण वैदिक बांग्मय मानव को प्रार्थना के माध्यम से धर्म से जोड़ते हैं। मानव की सुख शांति ही धर्म का प्रमुख ध्येय है। उन्होंने कहा कि हमें प्रार्थना उसी परम सत्ता से करना चाहिये जिसने यह सम्पूर्ण विश्व बनाया है। चींटी से लेकर हाथी तक, पृथ्वी से लेकर आकाश तक में जिसकी आत्मा विराजमान है। ऊंचे पर्वत, नदियां, निर्झर सागर ये सब परमात्मा की गति का आभास कराते हैं। वह सृजनकर्ता है। पालनकर्ता है एवं वही परमात्मा प्रलय और पुर्ननिर्माण कराता है। उसी परमात्मा ने सम्पूर्ण दृश्य देखने हेतु आंखे दी हैं। स्वाद लेने हेतु जीभ दी है। उन्होंने आगे कहा कि मानव अपने असित्व के मूल तात्पर्य को भूल चुका है। उसने यह अनुभव करना त्याग दिया है कि हम उसी विराट सत्ता के अंश है।