ललितपुर

आजादी के दीवाने की धरोहर को नष्ट कर रहे अराजक तत्व

बानपुर-।   सन् 1857 के स्वतंन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों से लोहा लेने वाले अमर शहीद महाराजा मर्दन सिंह को उन्ही की कर्म स्थली ऐतिहासिक ग्राम बानपुर में स्थित उनके किले को गाँव के ही कुछ अराजक तत्व नुकसान पहुंचा रहे हैं व सवकुछ जानते हुए भी प्रशासन मौन है । जहां पर किसी समय बानपुर नरेश महाराजा मर्दन सिंह का दरबार लगता था और जहां कभी अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त मंत्रणायें हुआ करती थीं और जो किला अंग्रेजों द्वारा बरसाये गये बारुद और गोलियों को अपने सीने पर झेलता रहा फिर भी खण्डहर अवशेष में इस अनन्त आकाश के नीचे गर्व से सिर ऊंचा किये खडा रहा और आज उसी स्थान को गांव के कुछ लोगों ने अपनी दैनिक क्रियाओं से निवृत होने का अड्डा बना लिया है यधपि आज महराजा मर्दन सिंह के वंशज यहां नहीं रहते किन्तू वे जब भी यहां आते हैं व लोगों को किले में शौच के लिए जाते हुए देखते है व अपनी निजी कार्यों के लिए किले की ईंटों एवं पत्थरों का दोहन करते हुए देखते हैं तो इस पीड़ा को उनके मुखारविन्द पर स्पष्ट रुप से महसूस किया जा सकता हैअपने जीवनकाल के दौर में कभी अंग्रेजों के लिए खौफ का पर्याय रहे महाराजा मर्दन सिंह को आजादी के बाद अपनों ने ही भुला दिया है । गांव के संभ्रान्त नागरिक अजीज खां मंसूरी बताते है ” कि महाराजा मर्दन सिंह छापामार लड़ईया युद्धकला में पारंगत थे वे अपने साथ सैनिकों की एक टुकड़ी अवश्य रखते थे व उन्होने तालबेहट व चन्देरी पर भी शासन किया इसी कारण अंग्रेज उनसे बहुत डरते थे ” । इसी क्रम में कस्बा निवासी कृष्ण प्रताप सिंह परमार बताते है कि महाराजा मर्दन सिंह उच्चकोटि के देशभक्त थे व उन्होने अपना सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि के लिए अर्पित कर दिया अन्त में अंगेरेजों ने इन्हें छल कपट से बन्दी बना लिया व लाहौर की जेल में भेज फिर बाद में मथुरा वृन्दावन में बन्दी बनाकर रखा गया अन्तोगत्वा इस महान क्रान्तिकारी ने अपने आराध्य की भूमि में ही अन्तिम साँस ली”।  परन्तु लगता है मां भारती के इस अमर सपूत को इतिहास के पन्नों तक सीमित कर दिया है इसलिए ऐतिहासिक दृष्टिकोंण से बानपुर व किला दोनों की ओर आज तक शासन प्रशासन का ध्यान नहीं गया है व यह ऐतिहासिक कस्बा विकास कार्यों में आज भी पिछडा हुआ है । आजादी के दीवानों की यादगारों को सहेजने की जरुरतशासन एवं प्रशासन को आज चाहिए कि राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम से जुड़े प्रत्येक अमर शहीद की यादगार का रखरखाव करें व इसके लिए लोगों को प्रेरित करें लेकिन इस दृष्टि से भी बानपुर पिछडा हुआ है व आज बानपुर के लोगों को अपने इस महान प्रशासक के बारे में जानकारी नहीं हैं निश्चित रुप से हम लोग प्रत्येक वर्ष स्वतन्त्रता संग्राम मनाते हैं परन्तु क्या हम शहीदों को आजतक सच्ची श्रृद्धाँजलि दे पाये है लगता है सैकड़ों सालों के इन्तजार के बाद आज बानपुर किले की बुर्जें इसी सवाल का जबाब ढ़ूंढ़ रही है ।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्हइस किले की जीर्ण – शीर्ण अवस्था को देखकर लगता है कि क्या यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की परिधि व उनके कार्यक्षेत्र से बाहर है या वह इसका रखरखाव करने में असमर्थ हैं । इसके अलावा बानपुर कस्बा पर्यटन की दृष्टि से काफी समृद्ध है इस कस्बे की गोद में इसके मोहल्ले गणेशपुरा में प्रसिद्ध एवं प्राचीन बाईस भुजाओं से सुशोभित एवं अद्वतीय गणेश मन्दिर की प्रतिमा, बजरंगढ़ मन्दिर, बाबा मजहर शाह की दरगाह, अतिशय जैन क्षेत्रपाल जी मन्दिर, जामा मस्जिद बानपुर , छोटा एवं बड़ा जैन मन्दिर ,अजयपार मन्दिर व बड़ी माता मन्दिर व किले की तलहटी में स्थित आश्चर्यजनक कुआं अगर उक्त जगहों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाये तो कस्बा विकास की ओर अग्रसर हो सकता है ।अमर सपूतों का कीर्ति स्तम्भ बनाया जाए आजादी के इन 71 सालों में शासन व प्रशासन ने कभी भी इस महान शहीद की पनाहगाह की तरफ कभी रुख नहीं किया व आजादी के दीवाने का नाम आज तक नहीं लिया ।आज तक किसी भी नेता व जनप्रतिनिधी द्वारा उनकी प्रतिमा कस्बे में नहीं लगायी गयी है क्या यह हमारी ओर से उनके महान प्रयास का प्रतिफल है कि उनके त्याग का मतलव सिर्फ उनके घरवाले ही समझें । अतः समस्त ग्रामवासियों ने प्रशासन से आग्रह किया है कि शीघ्र अति शीघ्र इस माँ भारती के अनन्य भक्त की प्रतिमा कस्बे के मुख्य चौराहे पर लगवायी जाये व स्वतन्त्रा संग्राम में कस्बे के जिन महान लोगों ने योगदान दिया है उनके कीर्ति स्तम्भ बनाये जाए अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि इनकी एक – एक यादगार संरक्षण के अभाव में नष्ट हो जायेगी ।    आमिर खाँन मंसूरी “पत्रकार